Monday, September 24, 2007

ॠण-ग्रस्त



Story copyright: Sukirti Bhatnagar

Story source: "अहस्ताक्षरित संधिपत्र": A Compilation of Stories, 1994

भाग 1

भाग 2

भाग 3

ॠण-ग्रस्त: अंतिम भाग



वे नवंबर-दिसंबर के ठिठुरते हुए दिन थे जब मीना रात-रात भर माँ के सरहाने बैठी रहती थी। उन दिनों माँ का चलना-फिरना समाप्त्प्राय हो गया था। वह बिस्तर पर ही मल-मूत्र त्याग देती थीं लेटे-लेटे उनके शरीर पर घाव हो गये थे, जिन्हें मीना बड़े प्रेम से साफ़ करती। हर आधे घंटे में पाऊडर छिड़कती। माँ को नहलाना-धुलाना, गंदगी साफ़ करना कोई आसान काम नहीं था। धन्य थी वह, जिसने अपनों से भी बढ़ कर माँ की सेवा की।

आज रात दो बजे माँ ने प्राण त्याग दिये। तब से सुगंधा उदास, चुपचाप माँ के घुटनों के पास बैठी है। तभी डा. सक्सेना ने तंद्रा भंग की – “डा. सुगंधा, मेरे विचार से अब बहुत देर हो गयी है। शव को अधिक समय घर में नहीं रखना चाहिये। आपके रिश्तेदार तो अब तक पहुंचे नहीं। हमें चाहिये, हम माँ का अंतिम संस्कार कर दें।”

उसने सोचा अब किसी के आने या न आने से क्या फ़र्क पड़ता है। बोझिल कदमों से वह उठ खड़ी हुई और बोली – “चलिये डाक्टर साहब, माँ को ले चलें।”

वही शम्शान घाट जहाँ पिछले वर्ष ही तो अविनाश का संस्कार हुआ था। तब माँ थी, जिसकी छाती से लग कर वह फूट-फूट कर रोई थी। पर आज ऐसा कौन है जो रिसते हुए घावों को सहला सके।

माँ के अंतिम संस्कार से लौटी तो भाई-भाभी, जीजा जी, मेघा और अन्य रिश्तेदार पहुंच चुके थे। सभी उसे देख कर बिलख-बिलख कर रो पड़े। पर उसने किसी से कुछ नहीं कहा, न रोई, न कुछ बोली। जाने कब तक शून्य में आँखें गड़ाये चुपचाप बैठी रही। उसकी अपनी तो बस एक माँ ही थी जो इस समय घर से बहुत दूर, धरती माँ की गोद में शाँत अकेली सोई हुई थी। शेष सब व्यर्थ है, दिखावा मात्र, उसका अन्तर्मन उसे कह रहा था।

प्यास से उसका गला सूख रहा था। उसने मीना को आवाज़ लगाई। शम्शान घाट जाने से पूर्व वह उसे कुछ आवश्यक निर्देश दे कर घर पर ही छोड़ गयी थी। पर अब वह कहीं भी दिखाई नहीं दे रही थी। साथ वाले कमरे में गयी तो गोदरेज की अल्मारी खुली पड़ी थी। उसने झटपट ड्राअर खोली तो सभी पैसे, उसकी सोने की चेन और बालियाँ नादारद थीं, जिन्हें व्यस्तता के कारण वह अल्मारी की ड्राअर में रख कर भूल गयी थी। अब स्थिति उसके सामने स्पष्ट हो चली थी कि मीना ने ही ये सब चीज़ें उठाई होंगी क्योंकि उसके घर की कोई वस्तु तथा उसके रखने का स्थान मीना से छिपा नहीं रह गया था। वह घर के सदस्य के समान ही पिछले चार महीने से उसके घर में रहती रही थी और सुगंधा को उस पर पूरा विश्वास हो गया था।

अब तक कई अन्य लोग भी पीछे-पीछे कमरे में आ गये थे। बड़े भैया ने कहा कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा देनी चाहिये क्योंकि मीना और उसका पति शहर से बाहर नहीं जा पाये होंगे।

सुगंधा की आँखों के सामने विगत वर्ष के वह सब दिन चरखी की तरह घूमने लगे जब माँ की संतान होने का कर्तव्य उनकी चारों संतानों को किसी न किसी कारण से, किसी न किसी क्षण एक बोझ प्रतीत हुआ। उस समय मीना ने माँ की अथक सेवा शुश्रूशा की। हाँ, पगार ले कर की, पर यही तो उसका कर्तव्य था। आज के स्वार्थी परिवेश में, जहां कोई नर्स अथवा सेवक पैसे ले कर भी, नाक-मुँह चढ़ा कर, केवल नाम-मात्र सेवा कर के चलते बनते हैं, मीना ने बड़ी लगन और नियमित रूप से, बिना माथे पर शिकन डाले, माँ को संभाले रखा। ऐसा तो स्वयं सुगंधा भी नहीं कर पाई थी।

उसने पल भर को भाई की आँखों में झाँका, फिर धीरे से बोली – “जाने दो भैया, जाने दो उसे। जिस लगन, प्रेम और अपनेपन से उसने हमारी माँ की सेवा की है, वह अकथनीय है। उसने जीवन के उस कठिन मोड़ पर, जब मैं नितांत अकेली रह गयी थी, माँ के हारे हुए तन और मेरे दुखी मन को सांत्वना एवं सहारे के अमृत से सींचा। दस-बीस हज़ार तो क्या, वह मेरा सर्वस्व भी ले जाती तो भी मैं आजीवन उसकी ॠणी रहती।”

सुगंधा जानती थी कि मीना का ॠण किसी भी अर्थ-शास्त्र के परे था और उसकी चोरी भले ही हर मानव निर्मित न्यायलय में दंडनीय हो, सुगंधा के ॠण-ग्रस्त हृदय में केवल आभार था, न्याय और दंड की हर दलील, हर दायरे के बाहर।

ॠण-ग्रस्त: भाग 2



अविनाश की मृत्यु के समय दोनो भाई, भाभियां, मेघा……सभी आये थे। मेघा पूरे दो महीने रही थी उसके पास। उसी दौरान उसने सुगंधा से माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के बारे में बात भी की थी – “सुगंधा, लगता है माँ कुछ ठीक नहीं हैं, कुछ भी तो खाती, पीती नहीं, दिनों दिन कमज़ोर होती जा रहीं हैं।”

“नहीं दीदी, तुम्हें वहम हो गया है। बुढ़ापा है, ऊपर से मेरा दुख क्या कम है उन्हें। बस इसीलिये कुछ खाने पीने को जी नहीं चाहता होगा” – सुगंधा ने लापरवाही से कहा था। जब तक मेघा रही थी, उसने माँ, सुगंधा और नन्ही शिखा का पूरा-पूरा ध्यान रखा था। पर उसके वापिस लौट जाने के बाद घर भर में गहन उदासी फैल गयी थी। भले ही माँ ऊपर से कितनी सहज और शांत दिखाई देती रहीं हों, किंतु अंदर ही अंदर वह घुटती रहती थीं, रोती रहती थीं। आख़िर वह एक माँ थीं और बेटी की अन्तरव्यथा को उनसे अधिक और कौन समझ सकता था। जाने कब से उनके पेट में हल्का-हल्का दर्द रहने लगा था किंतु सुगंधा की व्यस्तता और उसकी अन्य अनेक प्रकार की चिन्ताओं की बात सोच कर वह हमेशा चुप रह जातीं और अपने कष्ट की बात उससे कभी नहीं करतीं थीं। पर आखिर कब तक? अंदर ही अंदर बिमारी ने उग्र रूप धारण कर लिया था। बाद में पूरा चेक-अप करवाने के बाद पता चला कि उन्हें लीवर का कैंसर हो गया था जो अपनी आख़िरी स्टेज पर था। डाक्टर ने बताया कि उनके जीवन के मात्र दो-तीन महीने ही शेष रह गये हैं।

कैसी बौराई सी देखती रह गयी थी सुगंधा माँ को। तब उसे पहली बार माँ का चेहरा बहुत कमज़ोर दिखाई देने लगा था। गाल अंदर को धँस गये थे। आँखों के नीचे काले घेरे उभर आये थे और सारा शरीर झुर्रियों से भर गया था। मेघा तो पहले ही सचेत कर गयी थी पर वह ही कहाँ ध्यान दे पायी थी माँ की ओर। सारा दोष उसका है, केवल उसका। ऐसा मान, जाने कितने दिनों तक वह अंदर ही अंदर छटपटाती रही थी, हताहत होती रही थी। फिर उसके बाद शुरु हुआ था अस्पताल, डाक्टर, दवाइयों और टेस्ट का लंबा सिलसिला।

माँ अक्सर खोई-खोई आँखों से उसकी ओर निहारा करती थीं। एक रात उसके बाल सहलाते हुए बोलीं, “मैं जानती थी कि मुझे कैंसर है पर इसमें इतना घबराने वाली क्या बात है। हर किसी को कभी न कभी, किसी न किसी तरह इस संसार से विदा लेना है। समझो कि मेरा भी अंत समय अब निकट आ गया है। बस एक ही चिंता है कि मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा?” कैसी काली घटाऐं उमड़ आई थीं माँ की धुंधली हो आई पनीली आँखों में। इसके बाद उनकी हालत दिन पर दिन ख़राब होती गयी थी।

दोनों भाई, भाभियां पहुंचे थे माँ को अपने साथ लिवा ले जाने के लिये। माँ भी उनके साथ जाने को तैयार थी पर सुगंधा उन्हें कहीं भी किसी के भी पास नहीं भेजना चाहती थी। कई रातें वह अच्छी तरह सो नहीं पाई थी। रह-रह कर दोनो भाभियों का व्यक्तित्व उसके सम्मुख उजागर हो उठता था। छोटी भाभी, जो मुंबई में रहती थी, अपने दो साल के बेटे अंकुर को क्रैच में छोड़कर जाती थी। वैसे भी उसका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं रहता था। वह भला माँ को कैसे संभाल पायेगी। और बड़ी भाभी, उसके चार छोटे-छोटे बच्चे थे। उन्हें तैयार करना, स्कूल भेजना, उस पर घर के ढेरों काम थे करने के लिये। वैसे भी वह माँ को उतना सम्मान कभी नहीं दे पायी जितना उसे देना चाहिये था। उसके पास रह कर, बीमार और पूर्णत: उस पर आश्रित माँ के स्वाभिमान को ज़रा सी भी ठेस पहुंची तो वह और अधिक सहन नहीं कर पायेंगी। दूसरी तर्कसंगत बात यह भी उसके ध्यान में आई कि वह स्वयं डाक्टर है। इसके अतिरिक्त अस्पताल के दूसरे डाक्टर हर समय माँ की देखरेख में लगे रहते हैं। बहुत सोच विचार के बाद उसने माँ को अपने पास ही रखने का अंतिम निर्णय ले लिया और भाइयों को उससे अवगत करा दिया। इस विषय में भाइयों ने भी अधिक तर्क नहीं किया और दो-चार दिन बाद ही अपनी-अपनी नौकरियों और बच्चों के स्कूल की बात कह कर भाभियों सहित वापिस चले गये।

मेघा भी तुरंत चली आयी थी। उन दिनों माँ कुछ खाती पीती नहीं थीं। बस इंजेक्शन के सहारे ही ख़ुराक उनके अंदर पहुंचाई जाती थी। फिर भी मरीज़ के हज़ारों काम होते हैं जिन्हें बड़े धैर्य से करना पड़ता है और मेघा ने वे सब अच्छी तरह संभाल लिये थे। किंतु मेघा भी अधिक समय कहां रह पायी सुगंधा के पास। उसकी सासु-माँ बाथरूम में फिसल कर गिर पड़ीं और मेघा को बेबस हो कर लौटना पड़ा।

सुगंधा एक बार फिर ज़िम्मेदारियों और परेशानियों के साथ अकेली रह गयी थी। कभी-कभी उसका मन विद्रोही हो उठता था। वह सोचती, क्या माँ को संभालने की, सेवा करने की ज़िम्मेवारी केवल उसकी है? क्या औरों का माँ के प्रति कोई कर्तव्य नहीं? किंतु दूसरे ही पल वह स्वयं को कोसने लगती। आख़िर वह किसी दूसरे को दोष क्यों दे? उसने स्वयं ही तो माँ को संभालने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली थी और ऐसा कर के कोई एहसान तो नहीं किया उसने माँ या किसी और पर। यह चारपाई पर पड़ी हुई मजबूर, बीमार औरत उसकी माँ है। उसकी अपनी माँ, जिसने हर दिन, हर रात केवल उसके सुख की, उसकी हँसी-ख़ुशी की बात सोची। अपने को भूल कर केवल उसके दु:ख-सुख में खो जाने की कोशिश की थी। फिर आज उस माँ के प्रति निष्ठावान होने के स्थान पर वह हताश क्यों हो रही है।

इंसान का अपना मन ही उसका सब से बड़ा शत्रु भी है और मित्र भी। बस सोचने का ढंग सही होना चाहिये। एक बार फिर सुगंधा ने ऐसी कठिन परिस्थितियों में अपने आप को संभाल लिया था और किसी और पर आश्रित होने के स्थान पर स्वयं माँ की हर संभव सेवा का दृढ़ निर्णय ले लिया। भाग्य से उन्हीं दिनों, उसे एक पढ़ी-लिखी कुशल काम वाली मिल गयी। देखने में सौम्य और शालीन लगती थी। शीघ्र ही अपनी कार्यकुशलता से उसने सुगंधा का मन जीत लिया। तब सुगंधा ने उसे और उसके पति को घर का सर्वेंट-क्वार्टर रहने के लिये दे दिया था। उसका पति घर का सब काम करने लगा था और नौकरानी मीना ने माँ का सारा काम अपने ऊपर ले लिया था।

Sunday, September 23, 2007

ॠण-ग्रस्त: भाग 1



वह माँ ही थी जिसे सुगंधा जब जी चाहे नि:संकोच अपने पास बुला लेती थी, कभी अपने अकेलेपन के कारण तो कभी नन्हीं सी बच्ची की देखरेख के लिये। तीन वर्ष पूर्व जब पति अविनाश साल भर के लिये अमेरिका चले गये थे और सुगंधा की सासु-माँ को भी किसी कारणवश अपने मँझले बेटे के पास जाना पड़ा था, तब तत्काल सुगंधा ने माँ को बुला भेजा था। पूरे छः महीने रही थी माँ उसके पास।

कैसा स्नेहिल और दीप्तिमय व्यक्तित्व था माँ का। कुछ ही दिनों में कैसी घुल-मिल गयी थीं वह सबसे। सुगंधा डाक्टर थी। दिन भर की थकी-माँदी जब घर लौटती तो माँ को फाटक के पास ही खड़ा पाती। उसे लगता, वह उसकी माँ नहीं, एक शीतल, स्फ़ुर्तिदायक मेघखंड है जो उसके थके हुए तन और मन को अपार शांति और तृप्ति से भर देता है। नन्हीं शिखा की देखरेख, सुगंधा की घर-गृहस्थी की संभाल, सभी कुछ माँ ही करती थीं। घर का छोटा-मोटा सामान भी वह स्वयं ही पास वाली दुकानों से ख़रीद लाती थीं। छ: मास देखते ही देखते व्यतीत हो गये थे। अविनाश के अमेरिका से लौट आने के कुछ दिन बाद ही माँ वापिस दिल्ली चली गयी थीं।

ऐसा नहीं था कि उनके और कोई संतान नहीं थी। बड़ी बेटी मेघा अपने परिवार सहित बनारस में रहती थी। दोनों बेटों में से छोटा बेटा अनिल मुंबई में इंजीनियर था और बड़ा बेटा सुनील दिल्ली में वकालत करता था। माँ उसी के पास रहती थीं। पति का स्वर्गवास तो वर्षों पूर्व ही हो गया था। अब तो बस बच्चों का मुँह देख कर ही जीती थीं।

पिछले वर्ष भी तो वह सुगंधा के पास लखनऊ गई थीं। कैसे साधिकार बुला भेजा था सुगंधा ने उन्हें –
“माँ, अविनाश शायद दो सप्ताह के लिये जापान जायेंगे, शिखा और मेरा मन आपके बिना नहीं लगता, बस चिट्ठी मिलते ही चली आना”।

माँ चली आयीं थी फिर, पर कैसा आना था वह? अविनाश जापान तो नहीं जा सके, हाँ, माँ के पहुंचने के तीसरे दिन ही एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी। हाहाकार मच गया था घर भर में। हृदय के मानों टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। बसंती रंग बिखर कर आग के अंगारे बन गये थे। सुगंधा तो मानों जड़ हो गयी थी। उसके सामने तो रेगिस्तान से तपते जीवन का नितान्त अकेला लंबा सफ़र शेष रह गया था। फिर माँ वापिस नहीं लौटी थीं। लौटतीं भी कैसे, किसके सहारे छोड़ आती सुगंधा को।

जाने वाले को क्या कभी भुलाया जा सकता है? यादें तो मन के किसी अछूते कोने में हर पल दीपशिखा सी प्रज्वलित रहती हैं। किंतु जीवन कल्पना और यादों के सहारे नहीं कटा करता। जीने के लिये यथार्थ के कटु सत्य को स्वीकरना ही पड़ता है। सुगंधा ने भी अपनी नियति से समझौता कर लिया था। भरा-पूरा ससुराल था सुगंधा का किंतु पति की मृत्यु के उपरांत प्राय: सभी ने उससे नाता तोड़ लिया था।

घर के काम तो माँ संभाल लेती थीं किंतु कुछ काम ऐसे थे जो उसे स्वयं ही करने थे। अविनाश के प्राविडेंट फ़ंड और जायदाद संबधी व्यवस्थाओं के लिये उसे अकेले ही कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते। इसी तरह के और कई कार्यों में बहुत व्यस्त हो गयी सुगंधा। न उसे घर का ध्यान रहा, न शिखा का और न माँ का।

अपने एकांतिक क्षणों में वह हर पल यह अनुभव करती कि इतने बड़े संसार में केवल माँ ही उसकी अपनी है जिसके सहारे उसे जीवन काटना है। वास्तव में यह माँ की अपार ममता ही थी जो उसकी कार्यक्षमता को बढ़ाती थी, उसे संरक्षण प्रदान करती थी। सघन वट-वृक्ष की घनेरी छाया सा माँ का प्यार ही उसे टूटने से, बिखरने से बचाये हुए था।

किंतु आज वही माँ नहीं रहीं। उनका निर्जीव शरीर सफ़ेद चादर से ढका धरती पर पड़ा था। उनके दोनो निर्जीव हाथ छाती पर टिके हुए थे। वे हाथ जो अब कभी सुगंधा का सिर सहलाने को नहीं उठेंगे, वे बंद आँखें जो अब कभी उसके क्लांत तन-मन को संतोष प्रदान नहीं कर पायेंगी।

माँ चली गयी…माँ क्यों चली गयी? उन्होनें तो उसका साथ निभाने का वायदा किया था। माँ के पैरों के पास बैठी वह विचारों के तानों बानों में उलझी हुई थी। सहसा बिलख-बिलख कर रो पड़ी। तभी पास खड़े डा. गरेवाल ने उसके कंधे थपथपाते हुए कहा –

“Sugandha, you are a brave girl. You should not lose heart and face the tragedy boldly”

वह चुपचाप आँखें पोंछने लगी। तभी उसके सहकर्मी त्रिपाठी जी ने बताया कि उसने उसके सभी संबंधियों को तार डाल दिये हैं। धीरे-धीरे घर जान-पहचान वालों से भरता जा रहा था। पर सबसे बेख़बर एक बार फिर वह अपने अतीत में खो गयी।

"अहस्ताक्षरित- संधिपत्र", इतिहास शोध-संस्थान, नयी दिल्ली, 1994, प. 148-155

Friday, September 21, 2007

हम लड़कियां



"बेटी, ज़रा यह पतीला तो उठा दे नीचे से", कमर के दर्द से परेशान हो, मैने पास खड़ी धन्वी से कहा तो उसने पतीला मुझे पकड़ा दिया।

"कुछ और काम बताओ न दादी"

"लो, यह धनिया पत्ती साफ़ कर दो।"

कुर्सी पर बैठे-बैठे ही वह अपने नन्हें-नन्हें हाथों से धनिया की पत्ती को डंडियों से अलग कर कटोरी में रखने लगी। इस बीच मैने दाल-सब्ज़ी बना ली, फिर उसे नहला-धुला कर तैयार कर दिया तो देखा दोपहर का एक बज चुका है।

"अब तो खाना खाने का समय हो गया न दादी?"

"हाँ बेटी, तुम जा कर अपने पापा और दादा जी को बुला लाओ"

वह दौड़ती हुई कमरे में चली गयी।

"पापा उठो, खाना खा लो, दादा जी उठो, खाना खाओ। ये कोई सोने का टाइम है?"

इतना कह वापिस आ वह एक पटड़े पर खड़ी हो गई और रोटी बेलने की ज़िद करने लगी। सहसा उसके हाथ रुक गये।

"दादी, पापा और दादा जी तो बस आराम ही करते रहते हैं। घर का सारा काम तो मुझे और आपको ही करना पड़ता है, ऐसा क्यों?" उसकी भोली आँखों में ढेरों प्रश्न थे।

"बेटी, तुम्हारे दादा जी की कमर में बहुत दर्द रहता है, तभी तो लेटे रहते हैं और……", मेरी बात पूरी होने से पहले ही वह बोल पड़ी, " पर दादी, कमर में तो आपके भी बहुत दर्द रहता है, लेकिन आप……"

एकाएक वह चुप हो गयी। फिर धीरे से बोली, "हम करें भी तो क्या करें, लड़कियां जो हैं। आप भी लड़की, मैं भी लड़की। घर का काम तो हमें ही करना है।"

ऐसा कह वह फिर से टेढ़ी-मेढ़ी रोटियां बेलने लगी और मैं पनियाली आँखों से उसे देखती रह गयी, जिसे केवल पाँच वर्ष की अबोध अवस्था में ही अपने लड़की होने के अर्थ का आभास होने लगा था।

"समय का दर्पण", सुकीर्ति प्रकाशन, प. 24

Sunday, September 16, 2007

चलो गले मिल जाओ



धर्मान्धता की कट्टर
सीमा को तोड़ दो।
कैसा यह अलगाव दिलों का
इसको छोड़ दो।।

मंदिर पर प्रहार हुआ तो,
हिंदु मन क्यों भटका?
गुरुद्वारा जलता देखा तो,
सिक्ख भाई क्यों भड़का?

नहीं खुदा मस्जिद में रहता,
न वाहिगुरू गुरूद्वारे में।
नहीं मसीहा गिरिजाघर में,
देव न देवीद्वारे में।।

जहाँ प्रेम और त्याग, अहिंसा,
सेवा का वहीं निर्झर है।
मानवता हो लक्ष्य जहाँ का,
वहीं ईश्वर का घर है॥

ज्यों प्रकाश धरा को देते,
उज्जवल चांद सितारे।
सत्य धर्म भी सदा सिखाये,
कर्म करो उजियारे॥

मानव निर्मित मंदिर मस्जिद,
फिर से बन जायेंगे।
बिछड़ गए जो भाई-भाई,
फिर कैसे मिल पायेंगे॥

अपने ही हाथों मत काटो,
अपने ही अंगों को।
हा ! विषाक्त क्यों करते जाते,
सुख स्वपनिल इन रंगों को॥

आओ भाईयो साथ चलें हम,
ऐसी विषम घड़ी में।
बिखरे मोती गुँथ जायेंगे,
फिर से एक लड़ी में॥

दुखियारी माता के आँसू,
मिल कर हम पोंछेंगे।
हर अग्नि को शांत करेंगे,
प्रगति का हम सोचेंगे॥

जात-पात के भेद मिटा दो,
सब हैं भारत वासी।
अब न अपने ही घर में हों,
राम पुन: बनवासी॥

बालक हों या युवा नागरिक,
सब को यह समझाओ।
सब अपने ही संगी साथी,
नफ़रत दूर भगाओ॥

हिंसा की चिंगारी त्यागो,
मन की शक्ति बढ़ाओ।
नहीं कोई बेगाना हम में,
चलो गले मिल जाओ॥

"चेतना के स्वर", हिंदी भाषा सम्मेलन, . ४०- ४१

Monday, September 10, 2007

यूसुफ़ ख़ान का बक्सा



जब कभी यूसुफ़ ख़ान के बहु-बेटे उनसे मिलने आते, उनकी दृष्टी देर तक उस बक्से पर टिकी रहती जिसमें हमेशा ताला लगा रहता था और जिसे यूसुफ़ ख़ान कभी किसी के सामने नहीं खोलते थे। पर आज उनकी मौत के बाद यह सोच कर कि उनकी सारी जमापूँजी और वसीयतनामा इसी बक्से में होगी, उसका ताला तोड़ दिया गया। किंतु बक्से में से तीन जोड़ी कुर्ते-पायजामों तथा एक पत्र के इलावा उन्हें और कुछ न मिला। पत्र इस प्रकार था:


मैं यूसुफ़ ख़ान,

तुम तीनों बेटों का भाग्यशाली पिता। 'भाग्यशाली' इसलिये कि बुढ़ापे में जो दुर्दिन देखे, तुम लोगों का अपमानजनक व्यवहार, अवहेलना और स्वार्थपरता देखी, उसने आँखें खोल दीं और जीवन के इस कटु सत्य का आभास हुआ कि संसार में कोई अपना नहीं, यहां तक कि अपने बच्चे भी। इसी सत्य बोध से मेरा मोह भंग हो गया।

तुम लोगों की आशा के विपरीत जायदाद के नाम पर बना यह मकान धर्मार्थ दे रहा हूँ ताकि यहां स्कूल खुल सके। रही बात जमापूंजी की, तो अधिकतर पूंजी तुम तीनों की पढ़ाई, विवाह और तुम्हारी स्वर्गवासी माँ की असाध्य बिमारी पर ख़र्च हो गयी। जो थोड़ी बहुत बची है वह घर के पुराने नौकर लखन के नाम कर दी है, जिसने नि:स्वार्थ भाव से मेरी सेवा करते हुए एक सच्चे सेवक होने का धर्म निभाया। शेष बचे कपड़ों में से चाहो तो एक-एक जोड़ी ले लो। क्या पता बुढ़ापे में तन ढकने के काम आएं। बेटे तो तुम लोगों के भी बड़े हो रहे हैं न।

यूसुफ़ ख़ान

पत्र पढ़ कर सब को सांप सूंघ गया और वे फटी आंखों से बक्से में पड़े कपड़ों को देखते रह गये।

"समय का दर्पण', सुकीर्ति प्रकाशन, प. 20-21

Thursday, September 6, 2007

अपराध-बोध


Story Copyright: Sukirti Bhatnagar
Story Source: Assorted Compilation of Stories, "डूबते सूरज के साथ"
Image Copyright: Abstrato

Image Source: Flickr


भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4

अपराध-बोध: अंतिम भाग


एकाएक चैतन्य हो कर उन्होने पत्नी की ओर देखा जो पूर्ववत पड़ी थी। तभी अपने मन के डर को दूर करने के लिये उन्होने सत्या को ज़ोर से हिलाते हुए कहा, “उठो, थोड़ा पानी पी लो। बहुत देर से सो रही हो, गला सूख गया होगा।" सत्या के आँखें खोलते ही उन्होने चैन की साँस ली और उसे पानी पिलाने लगे। साथ ही पछतावे की भावना एक बार फिर उन पर हावी होने लगी। जैसा कि प्राय: होता आया था, उनके पास इसके अतिरिक्त कोई विकल्प न था कि वह अपने भूतकाल के दानव तथा मानसिक-शारीरिक नपुंसकता का सामना करें जिसने उनकी पत्नी के जीवन के उत्कृष्ट वर्षों को इतना असहाय, निर्बल एवं निरर्थक बना दिया था। उन्हें लगा अपराध-बोध के इस विशाल प्रवाह से बच पाना संभवत: उनके लिये बहुत कठिन था।

तभी सत्या की आवाज़ से वह पुन: सचेत हुए। उसे और पानी चाहिये था। उसकी ओर गहन दृष्टि डालते हुए उन्हें उसके चेहरे की आभा से उसके चरित्र की सबलता का आभास हुआ। साथ ही यह अनुभूति भी हुई कि उनकी कायरता एवं उदासीनता सत्या के समर्पण के गुण को नष्ट करने में सदैव ही असमर्थ रहीं, जब कि वह अपनी माँ के अनुचित व्यवहार के समक्ष झुकते ही रहे।

पर माँ तो केवल एक व्यक्ति……एक शरीर थी और शरीर नश्वर है। इस लिये माँ के निधन को अपनी और सत्या की मुक्ति समझना मात्र एक सरलमति निष्कर्ष होगा। बिहारी बाबू (और फलस्वरूप सत्या) माँ से भी अधिक अपनी भावनात्मक अचेतनता के शिकार थे। और भावनाओं का कोई जीवन-काल नहीं है। किसी भी भावना के प्रति सुषुप्तता अथवा उस से कन्नी काटने की चेष्टा ही उसे और बली बनाती है। मनुष्य केवल अपने विवेक के प्रयोग से उनके प्रती जागरूक हो सकता है और यही जागरूकता मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इस सत्य से साक्षात्कार होते ही उनके भयावह अतीत की कड़ियां एकाएक खंडित होने लगीं। उन्हें लगा कि वह जीवन-पर्यन्त जिस सत्य से दूर भागते रहे, उतना ही उनकी अक्षमताएं उनका पीछा करती रहीं। फलस्वरूप, उनकी पत्नी का जीवन दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों की एक अंतहीन श्रंखला बन कर रह गया।

अब जब वह और सत्या साथ-साथ थे, वह उन अमूल्य क्षणों की क्षतिपूर्ति करने का प्रयत्न करना चाहते थे जिन्हें उन्होने अपने अनुचित व्यवहार के कारण खो दिया था। इस क्षण उन्हे यह समझ आने लगा था कि वह सत्या की संपूर्ण देख-रेख तभी कर सकते हैं जब वह स्वयं को अपने अतीत से पूर्णत: मुक्त कर लें।

गहरे आंतरिक स्तर पर, यह बात उनके हृदय को अंदर तक बेध जाती कि उनके अथक प्रयास के बावजूद भी उनका प्रायश्चित शायद अधूरा ही रह जायेगा……शायद वह उस कारावास से कभी मुक्त नहीं हो पायेंगे, जिस में उन्होने स्वयं ही अपने आप को बंदी बना रखा था। उनका सामना इस तथ्य से भी हुआ कि असीम पछतावे की भावना ही सत्या के प्रति प्रेम एवं सेवा के प्रयत्न में विष घोल देती थी। प्रतिदिन भरसक प्रयास के बावजूद उन्हें यही लगता जैसे कहीं कुछ शेष रह गया है……जैसे सत्या इससे अधिक की अधिकारी है……जैसे नपुंसकता अभी भी किसी न किसी रूप में उन्हें सालती रहती है।

आज जब आचानक सत्या को सदा के लिये खो देने के भय से उनका सामना हुआ तो उनका अन्तर्मन परिवर्तित हो गया। जो साहस वह वर्षों तक नहीं जुटा पाये थे, अकस्मात ही उसकी कोंपलें उनके अंतस में फूटने लगीं। प्रत्यक्ष रूप से अपने अपराध-बोध का सामना करते ही उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह कृतज्ञता के निर्मल प्रवाह से पूर्णत: स्वच्छ हो गये हों और प्रथम बार जीवन के इस सत्य का बोध उन्हे हुआ कि मानसिक जागरूकता ही मुक्ति है। अपने अपराध-बोध के असली स्वरूप और उसके कारणों का ज्ञान होते ही वह उससे मुक्त हो चुके थे। उन्हे लगा जैसे अब तक वह एक दु:स्वप्न देख रहे थे और आँख खुलते ही एक नया सत्य……एक नवजीवन उन्हे इंगित कर अपनी ओर बुला रहा था……वह जीवन जो केवल सत्या और उनका था। अब सभी अवरोध समाप्त हो चुके थे तथा 75 वर्ष की वृद्धकाय अवस्था में भी वह स्वयं को युवा, सबल एवं हर्षित महसूस करने लगे थे।

किसी उचित शब्द के अभाव में यह कहा जा सकता है कि अब उनका प्रायश्चित पूरा हो सकेगा। परंतु प्रायश्चित एक नकारात्मक शब्द है और बिहारी बाबू के मन के सभी अभाव मिट चुके थे। अब वह प्रायश्चित, अपराध, पछतावे जैसी भावनाओं के परे थे और सत्या प्रथम बार पूर्णत: उनके साथ थी।

Wednesday, September 5, 2007

अपराध-बोध: उपान्त्य भाग




“अब क्या वहीं घुसे रहोगे पैसों में, या थोड़ा पानी भी पिलाओगे?”, सत्या की आवाज़ सुन जैसे सोते से जागे वह, और पैसों को डिब्बे में डाल, उसे पानी पिलाने लगे। भोजन का समय हो चला था। अक्सर सत्या को बैठने की स्थिति में कर, वह घूमने वाली छोटी मेज़ उसके पलंग से सटा कर उसे खाना परोस देते हैं। वह धीरे धीरे मूंग की धुली दाल में टुकड़े-टुकड़े की गयी रोटी गला-गला कर खाती रहती है। आज खाने की समाप्ति तक कमर के दर्द से बेहाल हो, एक ओर लुढ़क गयी वह। अब तो दो पल का बैठना भी सामर्थ्य से बाहर हो गया है। उसे पुन: बिस्तर पर लिटा बिहारी बाबू स्वयं भी पसीना-पसीना हो वहीं कुर्सी पर बैठ गये।

शरीर भले ही थक जाये किंतु मस्तिष्क तो क्रियाशील रहता है। पुरानी बातें सोचते समय बिहारी बाबू का मन फिर कड़वाहट से भर गया। जब सत्या ठीक थी तो माँ ने उसकी कीमत नहीं पहचानी और फूल सी लड़की का जीवन बर्बाद कर दिया। पर माँ से कहीं अधिक कसूरवार तो वह स्वयं हैं। पौरुषहीन तो पहले से ही थे, संस्कारविहीन और भावविहीन कैसे हो गये? भले ही माँ की मौत के बाद उसकी ओर ध्यान देना शुरू किया पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक दिन भयानक पेट दर्द से परेशान सत्या को अस्पताल में भर्ती कराया गया तो पता चला पेट का अल्सर फट गया है। तब मरते-मरते बची थी सत्या। ओस्टोपोरोसिस की वजह से हड्डियां भी खुरने लगीं थीं। एक बार घर के कपड़े सुखाते समय तार से उलझ कर जो गिरी तो फिर नहीं उठ सकी। कमर में एसी चोट लगी कि नीचे का हिस्सा मारा गया और बिना सहारे के उठना-बैठना कठिन हो गया।

बिजली चली गयी थी। सत्या परेशान हो जायेगी, यह सोच अलमारी में से हाथ का पंखा निकाल उसे डुलाने लगे और वह चुपचाप लेटी उन्हें निहारती रही। विश्वास से परे हो गया है बिहारी बाबू का आचरण। क्या यह वही इन्सान है जिसने उसकी पूरी जवानी कोल्हू में पिसते बैल सी स्वाह होती देखी पर कभी सांत्वना के दो शब्द नहीं बोल सका, उसके रिसते घावों पर प्रेम का मल्हम न लगा सका और उसके टूटते मन को सहारे की बैसाखियां न दे सका। पर अब रात-दिन उसी की चिन्ता है उसे, उसी के नाम की पुकार है हर पल। यह अवस्था, उस पर उसके अर्थहीन जीवन का बोझ उठाना, कितना दुरूह है सब। काश! वह इस प्रकार अपंगता की स्थिति में न होती। तभी हिलता पंखा सत्या के चेहरे से टकराया। “ओफ़्फ़ो, नाक तोड़ कर रख दी मेरी। अब जा कर लेट जाओ। बहुत हो गया पंखा डुलाना।” सचेत हो बिहारी बाबू उठ खड़े हुए। तभी बिजली आ गयी। दोपहर के तीन बज रहे थे। बाहर की चौंध आँखों में चुभने लगी तो पर्दे खींच, अंधेरा कर, कूलर चला कर लेट गये वह।

यह नींद भी कैसी अदभुत होती है। पूरी नींद ले लेने पर तन-मन दोनों ही फूल से हल्के हो जाते हैं और हर प्रकार की दुविधा, चिंता से कुछ देर को मुक्ति मिल जाती है। अभी कुछ ही देर आँख लगी थी कि सत्या की आवाज़ से हड़बड़ा कर उठ बैठे। वह बैठना चाहती थी। आधी नींद में बिहारी बाबू एकाएक झल्ला उठे।

“कुछ देर मुझे भी चैन से बैठने दोगी या सारा दिन यूँ ही कांय-कांय करती रहोगी। मैं भी इन्सान हूँ। मुझे भी आराम चाहिये।”

“अरे तो फिर नींद की गोलियां दे कर सुला क्यों नहीं देते इस धरती के बोझ को हमेशा के लिये।”

“अब चुप भी करो, बेकार की बातों से दिमाग मत चाटा करो”, कहते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ गये बिहारी बाबू। माया कब से दरवाज़ा खटखटा रही थी। अंदर आते ही वह समझ गयी कि माहौल गर्म है। बोली, “लाइये बाबू जी, मैं देखती हूँ इन्हे।" बिहारी बाबू की सहायता से उसे बिस्तर पर बिठा वह चाय बनाने चली गयी। जब तक उन दोनो का चाय-नाश्ता समाप्त हुआ, माया काम निपटा कर लौट गयी। सत्या को एक बार फिर लिटा बिहारी बाबू दरवाज़े के सामने कुर्सी खींच कर बैठ गये।

मन बोझिल हो रहा था और नसें टस-टस कर रहीं थीं। आज क्या हो गया था उन्हें जो बेबस पत्नी पर बरस पड़े। आखिर दोष ही क्या था उसका? दोष तो उनका अपना है जो घोड़े बेच कर सोते रहे। दोष तो हमेशा ही उनका ही रहा है।

शाम गहराने लगी थी। धीरे-धीरे दूर-पास की बत्तियां जलने लगीं तो सत्या का ध्यान आया। उठ कर बिजली जलाई तो देखा वह गहरी नींद में थी। जाने क्यों उसे इस प्रकार निश्चल पड़ा देख सिहर उठे वह। सत्या…उसके सिवा उनका है ही कौन इस संसार में। उसकी मौजूदगी का एहसास हर पल घर को क्रियाशील रखता है और एक गति से चलायमान रहते हैं सुबह-शाम, रात-दिन्। सत्या का सान्निध्य ही तो सार्थक करता है घर की परिभाषा को। अन्यथा आस-पास का नि:शब्द ठहराव तो उनके जीवन को घोर एकाकीपन से भर पूर्णत: समाप्त कर देगा और जीते जी मर जायेंगे वह सत्या के बिना।


क्रमश:………

Tuesday, September 4, 2007

अपराध-बोध: भाग 2


Image Copyright: Ken Chandler
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छोटी सी ही थी जब माँ चल बसी। तब शराबी पिता और तीन भाइयों का सारा काम उसके नन्हे कंधों पर आ पड़ा। भाई तो समय के साथ-साथ एक-एक कर के दूर-पार बस गये और नशेड़ी पिता ने उसकी उम्र से दस साल बड़े साधारण कद-काठी वाले बिहारी बाबू से उसका गठजोड़ कर सर का बोझ हल्का कर लिया। पर कब उठा पाई वह वैवाहिक जीवन का सुख्। भले ही घर के हालातों को देखते हुए वह सखियों संग सावन के झूले न झूल सकी पर अपनी कुंवारी आँखों में सपने तो उसने भी सजाये थे। किंतु उसके भाग्य में तो अंश-अंश बिखरना लिखा था। भूखी-प्यासी सारी-सारी रात बिना बिस्तर के कड़कती ठंड में ठिठुरती वह सोचा करती, ‘क्या एसा ही होता है विवाह?’ काश उसने विवाह न किया होता। पर वह सदैव मौन धारण किये रही। मुँह खोलती भी तो किसके सामने। भाइयों ने तो कभी उसकी सुधि ली ही नहीं और पिता नशे की हालत में एक ट्रक के नीचे आ स्वर्गवासी हो चुका था। रही बात बिहारी बाबू की, तो वह सब कुछ देखते हुए भी कुछ नहीं देखते थे। एसी ही भयंकर स्थितियों को झेलते हुए समय निकलता रहा और एक दिन उसकी हिटलर सास का देहांत हो गया। अब उसका एक-छत्र राज्य था घर में किंतु उत्साहीनता और असमर्थता आड़े आने लगी क्यों कि अब तक उसका शरीर विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो चला था।

तभी बाहर का दरवाज़ा खटका। “अजी सुनते हो, माया आई है”, अपने अतीत से बाहर आ उसने ज़ोर से पति को पुकारा तो वह चौंक कर उठ बैठे और दरवाज़ा खोल दिया। “अब तुम भी हाथ-मुँह धो लो, वह चाय बना रही है", तौलिये से हाथ पोंछते हुए बिहारी बाबू बोले तो नन्हें बच्चे सम मुँह बिसूरते हुए सत्या ने कहा, “हर समय बस यही काम…उठो-बैठो। मुझे नहीं उठना अब।” तब गीले तौलिये से ही उसका मुँह साफ़ कर वह चाय में डुबो-डुबो कर उसे बिस्कुट खिलाने लगे। बाद में स्वयं का नाश्ता कर बरसों पुराना ट्रांज़िस्टर आन कर दिया और कान से लगा समाचार सुनने लगे। एक ज़माना था जब बहुत कुछ पढ़ा-लिखा करते थे पर अब तो सब छूट गया है, बस एक ट्रांज़िस्टर के सहारे ही बाहर की दुनिया को जी लेते हैं।

“बाबू जी, आज तो बीबी को नहलाना होगा। दो दिन हो गये नहाए”, पास खड़ी माया ने पूछा तो उसकी 15-16 साल की बेटी को बरामदे से व्हील-चेयर लाते देख उठ खड़े हुए और अलमारी में से सत्या के धुले कपड़े और तौलिया निकाल लाए। अब तक माया बेटी की सहायता से सत्या को व्हील-चेयर पर बिठा कर नहलाने के लिये बाथरूम में ले गयी थी। फिर देर तक उन्हें नहलाने-धुलाने, कपड़े बदलने और बाल संवारने का क्रम चलता रहा। इसी बीच माया बिस्तर की मैली चादर और तकिये का गिलाफ़ बदल गयी। जब तक सत्या को पुन: बिस्तर पर लिटाया गया, वह थक टूट कर बेहाल हो गयी थी।

घर का सारा काम समाप्त कर, दोपहर का खाना बिहारी बाबू के पास ही टेबल पर रख जब माँ-बेटी चलीं गयीं तो उन्होने उठ कर दरवाज़ा बंद कर लिया। अब माया शाम को आयेगी, धुले कपड़े समेटने, दोपहर के दो-चार बर्तन मांजने और बुज़ुर्गों को चाय-नाश्ता