Story copyright: Sukirti Bhatnagar
Story source: "अहस्ताक्षरित संधिपत्र": A Compilation of Stories, 1994
मेरी माँ श्रीमती सुकीर्ति भटनागर की रचनायें।
Story copyright: Sukirti Bhatnagar
Story source: "अहस्ताक्षरित संधिपत्र": A Compilation of Stories, 1994
"बेटी, ज़रा यह पतीला तो उठा दे नीचे से", कमर के दर्द से परेशान हो, मैने पास खड़ी धन्वी से कहा तो उसने पतीला मुझे पकड़ा दिया।
"कुछ और काम बताओ न दादी"
"लो, यह धनिया पत्ती साफ़ कर दो।"
कुर्सी पर बैठे-बैठे ही वह अपने नन्हें-नन्हें हाथों से धनिया की पत्ती को डंडियों से अलग कर कटोरी में रखने लगी। इस बीच मैने दाल-सब्ज़ी बना ली, फिर उसे नहला-धुला कर तैयार कर दिया तो देखा दोपहर का एक बज चुका है।
"अब तो खाना खाने का समय हो गया न दादी?"
"हाँ बेटी, तुम जा कर अपने पापा और दादा जी को बुला लाओ"
वह दौड़ती हुई कमरे में चली गयी।
"पापा उठो, खाना खा लो, दादा जी उठो, खाना खाओ। ये कोई सोने का टाइम है?"
इतना कह वापिस आ वह एक पटड़े पर खड़ी हो गई और रोटी बेलने की ज़िद करने लगी। सहसा उसके हाथ रुक गये।
"दादी, पापा और दादा जी तो बस आराम ही करते रहते हैं। घर का सारा काम तो मुझे और आपको ही करना पड़ता है, ऐसा क्यों?" उसकी भोली आँखों में ढेरों प्रश्न थे।
"बेटी, तुम्हारे दादा जी की कमर में बहुत दर्द रहता है, तभी तो लेटे रहते हैं और……", मेरी बात पूरी होने से पहले ही वह बोल पड़ी, " पर दादी, कमर में तो आपके भी बहुत दर्द रहता है, लेकिन आप……"
एकाएक वह चुप हो गयी। फिर धीरे से बोली, "हम करें भी तो क्या करें, लड़कियां जो हैं। आप भी लड़की, मैं भी लड़की। घर का काम तो हमें ही करना है।"
ऐसा कह वह फिर से टेढ़ी-मेढ़ी रोटियां बेलने लगी और मैं पनियाली आँखों से उसे देखती रह गयी, जिसे केवल पाँच वर्ष की अबोध अवस्था में ही अपने लड़की होने के अर्थ का आभास होने लगा था।
"समय का दर्पण", सुकीर्ति प्रकाशन, प. 24

धर्मान्धता की कट्टर
सीमा को तोड़ दो।
कैसा यह अलगाव दिलों का
इसको छोड़ दो।।
मंदिर पर प्रहार हुआ तो,
हिंदु मन क्यों भटका?
गुरुद्वारा जलता देखा तो,
सिक्ख भाई क्यों भड़का?
नहीं खुदा मस्जिद में रहता,
न वाहिगुरू गुरूद्वारे में।
नहीं मसीहा गिरिजाघर में,
देव न देवीद्वारे में।।
जहाँ प्रेम और त्याग, अहिंसा,
सेवा का वहीं निर्झर है।
मानवता हो लक्ष्य जहाँ का,
वहीं ईश्वर का घर है॥
ज्यों प्रकाश धरा को देते,
उज्जवल चांद सितारे।
सत्य धर्म भी सदा सिखाये,
कर्म करो उजियारे॥
मानव निर्मित मंदिर मस्जिद,
फिर से बन जायेंगे।
बिछड़ गए जो भाई-भाई,
फिर कैसे मिल पायेंगे॥
अपने ही हाथों मत काटो,
अपने ही अंगों को।
हा ! विषाक्त क्यों करते जाते,
सुख स्वपनिल इन रंगों को॥
आओ भाईयो साथ चलें हम,
ऐसी विषम घड़ी में।
बिखरे मोती गुँथ जायेंगे,
फिर से एक लड़ी में॥
दुखियारी माता के आँसू,
मिल कर हम पोंछेंगे।
हर अग्नि को शांत करेंगे,
प्रगति का हम सोचेंगे॥
जात-पात के भेद मिटा दो,
सब हैं भारत वासी।
अब न अपने ही घर में हों,
राम पुन: बनवासी॥
बालक हों या युवा नागरिक,
सब को यह समझाओ।
सब अपने ही संगी साथी,
नफ़रत दूर भगाओ॥
हिंसा की चिंगारी त्यागो,
मन की शक्ति बढ़ाओ।
नहीं कोई बेगाना हम में,
चलो गले मिल जाओ॥
"चेतना के स्वर", हिंदी भाषा सम्मेलन, प. ४०- ४१

जब कभी यूसुफ़ ख़ान के बहु-बेटे उनसे मिलने आते, उनकी दृष्टी देर तक उस बक्से पर टिकी रहती जिसमें हमेशा ताला लगा रहता था और जिसे यूसुफ़ ख़ान कभी किसी के सामने नहीं खोलते थे। पर आज उनकी मौत के बाद यह सोच कर कि उनकी सारी जमापूँजी और वसीयतनामा इसी बक्से में होगी, उसका ताला तोड़ दिया गया। किंतु बक्से में से तीन जोड़ी कुर्ते-पायजामों तथा एक पत्र के इलावा उन्हें और कुछ न मिला। पत्र इस प्रकार था:

Story Copyright: Sukirti Bhatnagar
Story Source: Assorted Compilation of Stories, "डूबते सूरज के साथ"
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